Tuesday, June 8, 2010

अब भी अधूरी है शहीद बिरसा मुंडा का सपना


9 जून, शहादत दिवस पर विशेष
अंग्रेजों की शोषण नीति और असह्म परतंत्रता से भारत वर्ष को मुक्त कराने में अनेक महपुरूषों ने अपनी शक्ति और सामथ्र्य के अनुसार योगदान दिया. इन्हीं महापुरूषों की कड़ी का नाम है - 'भगवान बिरसा मुंडा'. 'अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज' अर्थात हमारे देश में हमारा शासन का नारा देकर भारत वर्ष के छोटानागपुर क्षेत्र के आदिवासी नेता भगवान बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों की हुकुमत के सामने कभी घुटने नहीं टेके, सर नहीं झुकाया बल्कि जल, जंगल और जमीन के हक के लिए अंग्रेजी के खिलाफ 'उलगुलान' अर्थात क्रांति का आह्वान किया. बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1874 को चालकद ग्राम में हुआ. बिरसा मुंडा का पैतृक गांव उलिहातु था. इनके जन्म स्थान को लेकर यद्यपि इतिहासकारों में मतभेद है कि उनका जन्म स्थान चालकद है या उलिहातु. बिरसा का बचपन अपने दादा के गांव चालकद में ही बीता. सन 1886 ई0 से जर्मन ईसाई मिशन द्वारा संचालित चाईबासा के एक उच्च विद्यालय में बिरसा दाउद के नाम से दाखिल कराये गए क्योंकि इनके माता-पिता ने ईसाई धर्म अपना लिया था. बिरसा मुंडा को अपने भूमि, संस्कृति पर गहरा लगाव था. उन दिनों मुण्डाओं/मुंडा सरदारों के छिनी गई भूमि पर उन्हें दु:ख था या कह सकते हैं कि बिरसा मुण्डा आदिवासियों के भूमि आंदोलन के समर्थक थे तथा वे वाद-विवाद में हमेशा प्रखरता के साथ आदिवासियों की जल, जंगल और जमीन पर हक की वकालत करते थे. पादरी डॉ0 नोट्रेट ने स्वर्ण का राज्य का हवाला देते हुए कहा कि यदि वे लोग ईसाई बने रहे तो और उनका अनुदेशों का पालन करते रहे तो मुंडा सरदारों की छिनी हुई भूमि को वापस करा देंगे. लेकिन 1886-87 में मुंडा सरदारों ने जब भूमि वापसी का आंदोलन किया तो इस आंदोलन को न केवल दबा दिया गया बलिक ईसाई मिशनरियों द्वारा इसकी भत्र्सना की गई जिससे बिरसा मुंडा को गहरा आघात लगा. उनकी बगावत को देखते हुए उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया. फलत: 1890 में बिरसा तथा उसके पिता चाईबासा से वापस आ गए.
1886 से 1890 तक बिरसा का चाईबासा मिशन के साथ रहना उनके व्यक्तितत्व का निर्माण काल था. 1890 में चाईबासा छोडऩे के बाद बिरसा और उसके परिवार ने जर्मन ईसाई मिशन की सदस्यता छोड़ दी क्योंकि मुंडाओं/सरदारों का आंदोलन मिशन के विरूद्ध था और लूथरन चर्च तथा कैथालिक मिशन ने आंदोलन का विरोध किया था. मुंडाओं ने ईसाई धर्म इसलिए अपनाया कि ईसाईयों ने यह भरोसा दिलाया था कि यदि वे ईसाई धर्म अपना लेंगे तो उनकी छिनी गई भूमि व विरासत उन्हें वापस दिला दी जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बिरसा मुंडा का संथाल विद्रोह, चुआर आंदोलन, कोल विद्रोह का भी व्यापक प्रभाव पड़ा. अपने जाति की दुर्दशा, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अस्मिता को खतरे में देख उनके मन में क्रांति की भावना जाग उठी. उन्होंने मन ही मन यह संकल्प लिया कि मुंडाओं का शासनव वे लायेंगे तथा अपने लोगों में जागृति पैदा करेंगे.
बिरसा मुंडा न केवल राजनीतिक जागृति के बारे में संकल्प लिया बल्कि अपने लोगों में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जागृति पैदा करने का भी संकल्प लिया. बिरसा ने गांव-गांव घुमकर लोगों को अपना संकल्प बताया. उन्होंने 'अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राजÓ (हमारे देश में हमार शासन) का बिगुल फूंका.
बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ उलगुलान का आह्वान किया. वे उग्र हो गये. शोषकों, ठेकेदारों और अंग्रेजी चाटुकारों को मार भगाने का आह्वान किया. पुलिस को भगाने की इस घटना से आदिवासियों का विश्वास बिरसा मुंडा पर होने लगा. विद्रोह की आग धीरे-धीरे पूरे छोटानागपुर में फैलने लगी. कोल लोग भी विद्रोह में शामिल हुए. लोगों को विश्वास होने लगा कि बिरसा मुंडा भगवान के दूत के रूप में शोषकों से मुक्ति के लिए स्वर्ग से यहां पहुंचे हैं. अब दिकुओं का राज समाप्त हो जाएगा एवं 'अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राज' कायम होगा. आदिवासी को यह पूर्ण रूप से विश्वास हो गया कि यदि वे सरकार के खिलाफ खड़े होंगे, सरकार का विद्रोह करेंगे तो उनका खोया हुआ राज भी वापस मिलेगा.
इस विद्रोह ने अंग्रेजी हुकूमत को झकझोर दिया. 22 अगस्त 1895 अंग्रेजी हुकूमत ने बिरसा मुंडा को किसी भी तरह गिरफ्तार करने का निर्णय लिया. जिला अधिकारियों ने बिरसा के गिरफ्तारी के संबंध में विचार-विमर्श किया. जिला पुलिस अधीक्षक, जीआरके मेयर्स को दंड प्रक्रिया संहिता 353 और 505 के तहत बिरसा मुंडा का गिरफ्तारी वारंट का तामिला करने का आदेश दिया गया. दूसरे दिन सुबह मेयर्स, बाबु जगमोहन सिंह तथा बीस सशस्त्र पुलिस बल के साथ बिरसा मुंडा को गिरफ्तार करने चल पड़े. पुलिस पार्टी 8.30 बजे सुबह बंदगांव से निकली एवं 3 बजे शाम को चालकद पहुंची. बिरसा के घर को उन्होंने चुपके से घेर लिया. एक कमरे में बिरसा मुंडा आराम से सो रहे थे. काफी मशक्कत के बाद बिरसा मुंडा को गिरफ्तार किया गया. उन्हें संध्या 4 बजे रांची में डिप्टी कलक्टर के सामने पेश किया गया. रास्ते में उनके पीछे भीड़ का सैलाब थी. भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी. ब्रिटिश अधिकारी को आशंका थी उग्र भीड़ कोई उपद्रव न कर बैठे. लेकिन बिरसा मुंडा ने भीड़ को समझाया. बिरसा मुंडा के खिलाफ मुकदमा चलाया गया. मुकदमा चलाने का स्थान रांची से बदलकर खूंटी कर दिया गया. बिरसा को राजद्रोह के लिए लोगों को उकसाने के आरोप में 50/- रुपये का जुर्माना तथा दो वर्ष सश्रम कारावास की सजा दी गई. उलगुलान की आग जरूर दब गई लेकिन यह चिंगारी बनकर रह गई जो आगे चलकर विस्फोटक रूप धारण किया. 30 नवम्बर 1897 के दिन बिरसा को रांची जले से छोड़ दिया गया.सारांश यहाँ
24 दिसम्बर 1899 को 'उलगुलान' पुन: प्रारंभ कर दिया गया. सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर थाने और रांची जिले के खूंटी, करी, तोरपा, तमाड़ और बसिया थाना क्षेत्रों में उलगुलान की आग दहक उठी. क्रांतिकारियों ने ईसाईयों की भीड़ और गिरजा घरों में तीन चलाये. बसिया में ईसाई मिशन पर तीरों की बौछार की गई. इस विद्रोह का मुख्य केन्द्र बिंदू खूंटी थाना क्षेत्र था. 07 जनवरी 1900 की बैठक के बाद विद्रोही करीब दस बजे दिन में खूंटी के लिए रवाना हो गये. विद्रोहियों ने खूंटी थाना में हमला कर दिया. थाने में घिरे कांस्टेबलों ने आगे बढ़ते भीड़ पर दो राउंड गोली चलाई पर गोली किसी को नहीं लगी. इससे बिरसा के अनुयायियों को यह विश्वास हो गया कि बिरसा की वाणी सत्य है. गोली नाकामयाब हो जाएगी. इससे विद्रोहियों की हिम्मत बढ़ी और उन्होंने पुलिस पर सिपाही की हत्या भीड़ ने कर दी. इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को अंदर से झकझोर दिया. 9 जनवरी 1900 को डोम्बारी से कुछ दूर सैंको से करीब तीन मील उत्तर में सईल रैकब पहाड़ी पर विद्रोहियों की सभा हो रही थी. सभा में तीन, धनुष, भाला, टांगी, गुलेलों से लैस बिरसा के अनुयायियों एवं विद्रोहियों के अंदर अंग्रेजों एवं शोषकों के खिलाफ लड़ाई लडऩे का जज्बा अंतिम चरण में था. तभी पुलिस पार्टी ने उस सभा के सामने आकर विद्राहियों को आत्म समर्पण एवं हथियार डालने को कहा. इतने में ही बिरसा मुंडा का दूसरे सबसे बड़े भक्त नरसिंह मुंडा सामने आकर ललकारते हुए कहा कि 'हमलोगों का राज है, अंग्रेजों का नहींÓ 'अगर हथियार रख देने का सवाल है तो मुण्डाओं को नहीं, अंग्रेजों को हथियार रख देना चाहिए. और अगर लडऩे की बात है तो वे खून के आखिरी बूंद तक लडऩे को तैयार है.Ó तब अंग्रेजी सेना ने भीड़ पर आक्रमण किया और विद्रोहियों को अंग्रेजों ने क्रुरता के साथ दमन किया. लेकिन विद्रोहियों ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय अंग्रेजों से लोहा लेते हुए शहीद हो गये. सईल रकब रकब पहाड़ी पर इस आक्रमण में 40 से लेकर 400 की संख्या में मुंडा लोग लड़ाई में मारे गये. विद्रोहियों पर इस घटना के बाद दमन और तेज हो गया. विद्रोहियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. 03 फरवरी 1900 ई को 500/- रुपये के सरकारी ईनाम के लालच में जीराकेल गांवों के सात व्यक्तियों ने बिरसा मुंडा के गुप्त स्थान के बारे में अंग्रेजों को बताकर धोखे से पकड़ लिया गया. बिरसा को पैदल ही खूंटी के रास्ते रांची पहुंचा दिया गया. हजारों की भीड़ ने तथा बिरसा के अनुयायियों ने बिरसा जिस रास्ते से ले जाया गया उनका अभिवादन किया. 1 जून 1900 को डिप्टी कमिश्नर ने ऐलान किया कि बिरसा मुंडा को हैजास हो गया तथा उनके जीवित रहने की कोई संभावना नहीं है. अंतत: 9 जून 1900 को बिरसा ने जेल में अंतिम सांस ली. बिरसा मुंडा के सपनों की भूमि पर आज विस्थापन का दंश लोग झेल रहे हैं. विकास के नाम पर औद्योगिकीकरण का रास्ता खुल रहा है लेकिन जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए कोई नीति या मसौदा तैयार नहीं है. सामाजिक परम्पराएं, सांस्कृतिक धरोहर बिखने लगी है. समाजवादी ढांचे का आदिवासी समाज पूंजीवादी ताकतों का दंश झेलने पर विवश है. क्या यहां आत्ममंथन करना जरूरी नहीं कि वर्तमान झारखण्ड की स्थिति और बिरसा मुंडा के सपना 'अबुआ: दिशोम रे अबुआ: राजÓ कितना प्रासांगिक है? आगे पढ़ें के आगे यहाँ

10 comments:

nitin tyagi said...

aik achchi jankari

June 11, 2010 at 9:53 AM
Indli said...

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June 13, 2010 at 11:44 AM
Jitendra Dave said...

Excelleent informative article.

June 19, 2010 at 3:15 AM
Anonymous said...

यह सिर्फ एक जानकारी नहीं , अपने मिट्टी, समाज और देश पर निस्वार्थ मर मिटने वाले की कहानी है ।

March 23, 2012 at 8:45 AM
Lalit gavit said...

jay adivasi.............................................................

January 27, 2014 at 9:48 PM
Anonymous said...

जानकारी क लिये बहोत बहोत धन्यवाद

June 9, 2015 at 11:33 AM
Durgadas Guvhade said...

JAY BIRSA

July 14, 2015 at 10:24 AM
Manoj Waskel said...

Jay Adivasi Hum Desh Ke Mulnivasi Hai

August 11, 2015 at 1:14 PM
Dhananjay 09687 said...

बिरसा मुंडा (हमारे देश) Jai sarna

November 17, 2016 at 12:32 PM
Jayesh said...

धन्यवाद बहोत ही अच्छी जानकारी

May 24, 2017 at 8:11 AM

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